Blog

भारतीय कंटेंट स्टार्टअप्स के लिये सुनहरा अवसर

By on March 28, 2018

For the English version click here

रिलायंस जियो भारतीय टेलीकॉम उद्योद में ऐसा परिवर्तन लाया है, जिसने उनकी व्यापर रणनीति के कट्टर आलोचकों को भी  झुकने पर मजबूर कर दिया । जियो के कारण आयी इंटरनेट दरों में गिरावट ने आम भारतीय के डेटा उपभोग को कई गुना बड़ा दिया है| लोग एक दिन में इतना डेटा इस्तेमाल करने लगे जितना पहले पूरे महीने में किया करते थे।

पहले भारत का डिजिटल सपना सिर्फ स्मार्टफोन्स के बढ़ते इस्तेमाल पर निर्भर था।  जिओ ने हमारे उपभोक्ताओं को सस्ता इंटरनेट डेटा उपलभ्ध करवाकर भारतीय डिजिटल सपने को नए  मुकाम पर पहुँचाया है। बढ़ते स्मार्टफोन के चलन और सस्ते डेटा की वजह से आज कंटेंट स्टार्टअप्स को नए अवसर  मिल रहे हैं। हम भारतीय उपभोक्ताओं और भारतीय कंटेंट के संजोग से बनी ऐसी कम्पनीज़ की कल्पना करते हैं, जो कभी नेटफ्लिक्स और फेसबुक से बराबरी कर सकें |

आज स्टार्टअप्स के पास एक कंटेंट प्लेटफार्म बनाने का बेहतरीन मौका है। एक बड़ा प्लेटफार्म बनाने के लिए स्टार्टअप्स को तीन चीज़ो का विशेष रूप से ख्याल रखना पड़ेगा  – कंटेंट बनाने का तरीका, कंटेंट सेवन की आवृति (फ्रीक्वेंसी) एवं कंटेंट वितरण का तरीका | इन तीन पहलुओं पर हम अपने विचार आपके सामने रखना चाहते हैं।

कंटेंट बनाने का तरीका – हम ऐसे कंटेंट प्लेटफॉर्म को समर्थन देने में विश्वास करते हैं जहाँ उपभोक्ता अपने कंटेंट का निर्माण खुद करते हैं या फिर ऐसे प्लेटफॉर्म्स जहाँ पर कंटेंट बहुत से स्रोतों से इकठ्ठा किया जाता है |

कंटेंट की रचना कौन करता है, इसके अनुसार हम स्टार्टअप्स को तीन श्रेणियों में बांटते हैं; एक यूजर जनरेटेड कंटेंट (UGC) स्टार्टअप्स  जो उपभोक्ता को कंटेंट बनाने में मदद करे (जैसे यूट्यूब या इंस्टाग्राम), एक जो कंटेंट को काफी सारे स्रोतों से एक जगह इकठ्ठा करें (जैसे स्पोटिफाई) और एक जो अपना कंटेंट खुद बनाएं  (जैसे डिज़नी)। इनमे से हमारा झुकाव पहले दो की तरफ रहेगा।

UGC प्लेटफॉर्म लोगों को अपने आपको व्यक्त करने में मदद करते है और कंटेंट का निर्माण कुछ रचनात्मक लोगों तक सीमित न रहकर सभी तक पहुँचती है । ऐसे प्लेटफॉर्म उपभोक्ताओं की विविधता, भाषा, कंटेंट प्रकार आदि को ध्यान में रखते हैं और इनकी पहुंच बड़े पैमाने तक रहती है| इसी कारण ये प्लेटफॉर्म्स नए ट्रेंड और रुचियों से परिचित रहते हैं । जब उपभोक्ता प्लेटफार्म पर खुद कंटेंट बनाने लगते हैं तो स्टार्टअप को कंटेंट बनाने में पैसा खर्च नहीं करना पड़ता, इससे स्टार्टअप का कैपिटल बेहतर तरीके से प्रयोग होता है | ऐसे प्लेटफॉर्म्स पर उपभोक्ता अपने नेटवर्क से जुड़े रहकर प्लेटफार्म को मज़बूत  बनाते हैं |

हर नया उपभोक्ता प्लेटफॉर्म पर सभी के लिए महत्वपूर्ण हैं। यूट्यूब, ट्रिप एडवाइज़र, रेडिट आदि कुछ उदाहरण हैं जिन्होंने यह सिद्ध किया है कि उपभोक्ता कंटेंट के लिए प्लेटफॉर्म पर आतें हैं, पर वे कंटेंट की विविधता, नवीनता  एवं अन्य उपभोक्ताओं से जुड़े होने के कारण, प्लेटफॉर्म पर बने रहते हैं। हमें लगता है कि मनोरंजन, धर्म, भोजन, लाइफस्टाइल, स्वस्थ्य आदि श्रेणियाँ में ऐसे प्लेटफार्म बनाने के बड़े अवसर है।

कुछ श्रेणियाँ जैसे समाचार, संगीत, खेल, सिनेमा, शो आदि के लिए उच्च गुणवत्ता कंटेंट की आवश्यकता होती है| ऐसी श्रेणियों के लिए विभिन्न स्त्रोंतों से कंटेंट को इकट्ठा करना बेहतर है क्योंकि यह सुनिश्चित करता है कि कंटेंट गुणवत्ता मापदंड के पैमाने पर खरा उतरे । UGC प्लेटफार्म की तरह, एग्ग्रीगेटर्स अधिक से अधिक लोगों तक पहुँच बढ़ाते हैं और विभिन्न स्रोतों के बलबूते पर नए ट्रेंड और रुचियों से अवगत रहते हैं। यह कंटेंट बाकी जगह भी उपलब्ध होता है व इस कंटेंट के आधिकारिक स्टार्टअप प्लेटफॉर्म्स नहीं होते । इसीलिए स्टार्टअप प्लेटफॉर्म्स को उपभोक्ताओं को अलग अलग  कंटेंट् स्रोतों से बेहतर अनुभव प्रदान करना चाहिए (जैसे की, आटोमेटिक चयन / बेहतर वितरण / निजीकरण आदि) जिससे कि उपभोक्ता प्लेटफॉर्म से जुड़ा रहे।

हालाँकि तीसरे तरीके यानि कि उच्च गुणवत्ता कंटेंट बनाने से एक दिलचस्प बिज़नेस खड़ा किया जा सकता है (उदाहरण के लिए दस से बीस मिनट की वेब सीरिज़), पर ऐसी कंपनियां मीडिया कंपनियों की तरह होती है । ऐसी कंपनियों में टेक्नोलॉजी से ज़्यादा रचनात्मकता का महत्व है, जिसके कारण ऐसी कंपनियों के एक जोखिम भरा हिट या फ़्लॉप बिज़नेस बन जाने की संभावना रहती है । एक प्रौद्योगिकी (टेक्नोलॉजी) निवेशक के तौर पर, इस तरह के मॉडल हमें आकर्षित नहीं करते, क्योंकि उन्हें बहुत आगे तक बढ़ाना मुश्किल है और टेक्नोलॉजी की भूमिका भी सीमित है।

कंटेंट सेवन की आवृति (फ्रीक्वेंसी) – हम या तो उच्च-आवृति कंटेंट प्लेटफॉर्म का समर्थन करते हैं या फिर ऐसे कम-आवृति प्लेटफॉर्म का समर्थन करने में विश्वास करते है जो ट्रांसेक्शन करवाएं।

कंटेंट कंपनी को अधिक उपभोक्ता आकर्षित करने के लिए, एक ऐसा प्लेटफार्म चाहिए जो उपभोक्ताओं द्वारा अक्सर इस्तेमाल हो। जब उपभोक्ता प्लेटफार्म पर ज्यादा वक़्त और ध्यान देते हैं, उनका प्लेटफॉर्म के के प्रति रुझान बढ़ जाता है। यह रुझान  एक मुद्रा कि तरह काम करता है जिससे प्लेटफॉर्म पर कई यूज़-केसेस बनाने का मौका मिलता है| इसके परिणामस्वरूप प्लेटफार्म को कई तरीके से मोनेटाइज किया जा सकता है । यूट्यूब इसका एक बहुत अच्छा उदाहरण है, जो वीडियो स्ट्रीमिंग से शुरू हुआ था और आज यूट्यूब पर लाइव वीडियो, म्यूजिक स्ट्रीमिंग, यूट्यूब किड्स, यूट्यूब मूवीज, सोशल लेयर आदि जैसे कई  यूज़ – केसेस उपलब्ध हैं ।

हमारी राय में, अक्सर इस्तेमाल होने वाले प्लेटफॉर्म बनाने का एक अच्छा नुस्खा लोगों के मनोरंजन की ज़रूरतों को पूरा करना है। यूट्यूब स्ट्रीमिंग, नेट्फलिक्स की फिल्में, वॉटपैड कहानियाँ  आदि मूल रूप से उपभोक्ताओं के मनोरंजन के लिए बने हैं । मनोरंजन प्लेटफार्म के उपयोग को बढ़ाता है और ज्यादा से ज्यादा लोगो को आकर्षित करता है जिससे f प्लेटफार्म से जुड़े और व्यस्त रहते हैं । हालाँकि फेसबुक और यूट्यूब पहले से ही इस स्थान में मौजूद हैं, पर 30 करोड़ भारतीय  उपभोक्ताओं तक पहुंचने का एक बहुत बड़ा अवसर अभी भी सामने है। इंटरनेट का 99.9% कंटेंट उन भाषाओं में है जो 90% भारतीय समझ ही नहीं सकते | साथ ही हमारी लोकल भाषाओं के इंटरनेट उपभोक्ता हर साल 40 प्रतिशत से बढ़ रहे है| यह बहुत ही महत्वपूर्ण अवसर प्रदान करता है – स्टार्टअप्स, कंटेंट के प्रारूप (ऑडियो, वीडियो, जीआईएफ), कंटेंट के प्रकार ( छोटे और मुक्त सर या बड़े और आकर्षक) और कंटेंट की श्रेणियों (धर्म, बॉलीवुड, राजनीति) आदि के आधार पर अपने कंटेंट को नए तरीके से बना सकते हैं और अभिनव उदाहरण खड़े कर सकते हैं।

ट्रांसेक्शन केन्द्रित कंटेंट प्लेटफॉर्म के अवसर : पर्यटन, शिक्षा, फैशन, फूड, फिटनेस इत्यादि ऐसी श्रेणियों हैं जिनमे उपभोक्ताओं कि कंटेंट पढ़ने की आवृति काफी सीमित है| पर ऐसी श्रेणियों में उपभोक्ताओं के साथ गहराई से जुड़ कर बहुमूल्य बिज़नेस बनाया जा सकता है| इन श्रेणियों में  ऐसे कंटेंट प्लेटफॉर्म बनाने का अवसर है जो ट्रांसेक्शन केन्द्रित बिज़नेस बन सकें ।

ऐसे प्लेटफॉर्म्स में श्रेणी के अनुसार फीचर बनाये जा सकते हैं | ऐसा करने से स्टार्टअप प्लेटफॉर्म्स बाकी अंतरराष्ट्रीय प्लेटफॉर्म्स (फेसबुक, यूट्यूब,इंस्टाग्राम आदि) से हटकर एक विभिन्न पहचान बना सकते हैं और अलग अलग प्रकार के  मॉनीटाइज़शन तरीके आजमा सकते हैं। कुकपैड, हाउस, ट्रिप एडवाइजर, स्टैकओवरफ्लो, ऐसे अन्तराष्ट्रीय उदाहरण है जिन्होंने ऐसी श्रेणियों में विशाल बिज़नेस बनाये हैं |

कंटेंट वितरण – हम यह मानते हैं कि जिन प्लेटफॉर्म का अपने दम पर वितरण (जैसे मोबाइल ऐप या वेबसाइट) होता है वह आगे चल कर बहुमूल्य हो जाते है और इनसे कम्पीट करना बहुत मुश्किल होता है|

अपने उपभोक्ताओं को अपने साथ बनाये रखने के लिए यह आवश्यक है कि स्टार्टअप्स अपना कंटेंट वितरण नेटवर्क खुद बनाये और किसी तृतीय पक्ष के प्लेटफॉर्म पर निर्भर ना रहें। खुद के वितरण से उपभोक्ताओं का डेटा (सन्दर्भ) मिलता है, तृतीया पक्ष प्लेटफॉर्म अपना उपभोक्ताओं का डेटा शेयर नहीं करते| इस डेटा के इस्तेमाल से ना केवल प्लेटफार्म को सुधारा जा सकता है बल्कि उपभोक्ताओं की टार्गेटिंग भी बेहतर  की जा सकती है। अपना वितरण प्लेटफार्म बेहतर मॉनिटाइजेशन के लिए भी आवश्यक है। खुद का वितरण प्लेटफार्म बनाना शुरुआत में मुश्किल हो सकता है पर उपभोक्ताओं के बढ़ने के साथ साथ इसके फायदे सामने आने लगते हैं| वहीं तृतीया पक्ष के प्लेटफॉर्म पर वितरण शुरू में ज़्यादा आकर्षक लगता है, पर बढ़ते उपभोक्ताओं के साथ इसकी सीमाएँ सामने आने लगती हैं ।

तृतीया पक्ष प्लेटफार्म पर निर्भर होने के कारण स्टार्टअप का विकास निश्चित रूप से सीमित हो जाता है और विज्ञापन रेवेन्यू भी  कम हो जाता है। साथ ही, किसी और के प्लेटफार्म पर अपने उपभोक्ता की जरूरतों को समझना मुश्किल है क्यूंकि आपको उनके डेटा पर कोई अधिकार नहीं होता। भारत में तृतीया पक्ष  प्लेटफार्म पर निर्भरता और भी बुरी है क्यूंकि यहाँ सभी प्रमुख प्लेटफॉर्म्स फसेबूक के आधीन है और उनकी नीतियों में किया हुआ कोई भी बदलाव सीधा स्टार्टअप के बिज़नेस मॉडल को चोट पहुंचा सकता है।

तृतीया पक्ष प्लेटफॉर्म्स (जैसे यूट्यूब, व्हाट्सऐप, इंस्टाग्राम और फेसबुक) के जरिये खुद के उपभोक्ताओं को बढ़ाना नुक्सानदेही नहीं है । इन प्लेटफॉर्म्स के जरिए उपभोक्ता बढ़ाना अच्छा है क्यूंकि इन प्लेटफॉर्म्स के पास करोड़ो की संख्या में उपभोक्ता हैं और यहाँ से जितने उपभोक्ता लाये जा सकें उतना अच्छा है|   ऐसा करते समय यह ध्यान रखना चाहिए कि ये प्लेटफॉर्म्स सिर्फ उपभोक्ता अर्जित करने का ज़रिया है परन्तु एक बार जुड़ने के पश्चात्, उपभोक्ता को संलग्न रखने के लिए स्टार्टअप्स को स्वयं के प्लेटफार्म पर ही काम करना पड़ेगा |

कंटेंट स्टार्टअप्स को मोनेटाइज कैसे किया जाए यह एक बड़ा सवाल है। चूंकि हम प्राथमिक चरण पर निवेश करते हैं, हमारे लिए मॉनीटाइज़ेशन के आधार पर निर्णय लेना  काफी मुश्किल है। सक्रिय रूप से वेबसाइट, एप्लीकेशन या उनके बीच में किसी भी तरीके से कंटेंट के मॉनीटाइज़ेशन को हम तीन श्रेणीओं में बाँट सकते हैं – विज्ञापन व्यापार, सब्सक्रिप्शन व्यापार, और एफिलिएट व्यापार|

हम मानते हैं कि आज भारतीय डिजिटल विज्ञापन व्यापार में गूगल और फेसबुक के वर्चस्व को तोड़ने का अवसर है | जबकि एफिलिएट व्यापार का विस्तार करने के लिए वैश्विक पैमाने की जरूरत है और सब्सक्रिप्शन व्यापार को बहुत आगे तक बढ़ाना मुश्किल है।

भारतीय डिजिटल विज्ञापन मार्केट लगभग दस हज़ार करोड़ रुपये की है और यह 40% सालाना की दर से बढ़ रही  है| हमें ऐसा लगता है कि भारतीय डिजिटल विज्ञापन मार्केट में 10% मार्केट शेयर हासिल करने का और मौज़ूदा वर्चस्व  को तोड़ने का अवसर है| हमें ऐसा भी लगता है कि एक डिजिटल कंटेंट प्लेटफार्म अन्य तरह के विज्ञापन (टीवी या पत्रिका) को भी आकर्षित कर सकता है| विज्ञापन व्यापार में महत्वपूर्ण हिस्सा प्राप्त करने के लिए, कंटेंट प्लेटफार्म को अधिकाधिक उपभोक्ताओं को अपने प्लेटफार्म से जोड़कर  रखना होगा |

रोचक तथ्य: दुनिया के किसी अन्य देश के विपरीत भारत के टीवी विज्ञापन (8% प्रतिवर्ष) और प्रिंट विज्ञापन (5% प्रतिवर्ष) बढ़ रहे हैं। इसका कारण इंटरनेट पर स्थानीय भाषाओ के कंटेंट की कमी के अतिरिक्त कुछ नहीं हो सकता|

हमारा मानना है कि एफिलिएट कमीशन के माध्यम से मॉनेटाइज करने वाले प्लेटफार्म को अर्थपूर्ण रेवेन्यू प्राप्त करने के लिए  एक वैश्विक स्तर की जरूरत है | भारत में एफिलिएट कमीशन देने वाले ऑनलाइन खिलाड़ियों (ब्रांड, रिटेलर्स) की कमी है और एक मात्रा से अधिक एफिलिएट बिक्री के खिलाड़ी विरुद्ध  हैं।

जहाँ तक सब्सक्रिप्शन बिज़नेस का सवाल है, भारतीय उपभोक्ता टीवी के लिए भुगतान करते  है (टीवी मार्केट 9.2 % से हर साल बढ़ रहा है और 2025 में एक लाख करोड़ तक पहुंच सकता है), शिक्षा के लिए भी भुगतान करते हैं (BYJU ही 600 करोड़ रुपये की सालाना बिक्री) और मनोरंजन के लिए भी भुगतान करते हैं (नेटफ्लिक्स के 50 लाख उपभोक्ताओं में से 8% भुगतान करते हैं, हॉटस्टार के 7.5 करोड़ उपभोक्ताओं में से 4% भुगतान  करते हैं)| ऐसे सफल उदाहरणों के होने के बावजूद,हमारा मत है की, कंटेंट की उच्च गुणवत्ता व टेलीकॉल सेल्स की ज़रुरत और इंटरनेट का अधिकांश तौर पर मुफ्त सामान के गंतव्य जैसा इस्तेमाल, इत्यादि जैसे कारण सब्सक्रिप्शन रेवेन्यू बिज़नेस को बढ़ाना और बनाये रखना मुश्किल कर देते हैं ।

 

हमें लगता है कि हमारा यह द्रष्टिकोण एक निर्देशक सिद्धांत के रूप में काम करता है पर स्टार्टअप्स अपनी रणनीति खुद बनाते हैं| स्टार्टअप्स हमेशा भविष्य को एक नया रूप देने का प्रयास करती हैं | अगर आप इस क्षेत्र में कुछ अच्छा और रोमांचक बनाने का प्रयास कर रहे है तो मैं डिबेट/चर्चा के लिए आपसे मिलने का इच्छुक रहूँगा | आप मुझे mridul@stellarisvp.com पर सम्पर्क कर सकते हैं |

 

Sign up for Updates